दोस्त, दोस्ती और सिनेमा

>> Sunday, August 2, 2009

आज के दिन को या कि कहें अगस्त के पहले रविवार को पूरे विश्व में फ्रेंडशिप डे या मित्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। एस एम् एस ने हमारे जीवन को कुछ इस तरह से आरामदेह बना दिया है कि एक ही मेसेज जो कि आपको भी किसी और ने भेजा है के साथ ज़रा सी फेरबदल करके आप उसे सेंड ऑल करके सभी दोस्तों को एक साथ फ्रेंडशिप डे की शुभकानाएं दे कर अपना सन्डे मज़े से बिता सकते हैं। खैर दोस्तों और दोस्ती की बात हो और सिनेमा के रुपहले परदे पर दिखाई गई दोस्ती की बात ना हो ऐसा तो हो नहीं सकता। मैंने सोचा आज फ्रेंडशिप डे पर एक विशेष पोस्ट लिखी जाए जिसमें मेरे पसंदीदा दोस्ती गीतों के साथ साथ हम यह दिन सेलिब्रेट करें, आइये शुरू करते हैं 1964 में आई राजश्री बैनर के तले बनी फ़िल्म दोस्ती के टाइटल ट्रैक के साथ, सुधीर कुमार (जिन्होंने अंधे मोहन की भूमिका अदा की थी) और सुशील कुमार के अभिनय से सजी इस लो बजट फ़िल्म ने उस वर्ष सफलता के झंडे गाडे थे और उसके सफल होने के पीछे बहुत बड़ा कारण लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का सुमधुर संगीत भी था, जिसके लिए उन्हें उनका सबसे पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड भी हासिल हुआ था, जबकि उनका मुकाबला उस वर्ष के दिग्गज संगीतकारों शंकर जयकिशन (संगम) के साथ था। आवाज़ मुहम्मद रफी की, तर्ज़ लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की और बोल मजरूह सुल्तानपुरी के :



इसके बाद पेश है मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गबन पर आधारित कृशन चोपडा और हृषिकेश मुख़र्जी द्वारा निर्देशित फ़िल्म गबन (1966) का यह गीत। फ़िल्म गबन कुछ ख़ास सफल नहीं हुयी पर शंकर जयकिशन के संगीत से सजा उसका यह गीत बड़ा ही मधुर है, जिसमें नायक रामनाथ (सुनील दत्त) अपने दोस्तों की दोस्ती से कुछ इस तरह प्रभावित है कि मोहम्मद रफी की आवाज़ में वह गुनगुना उठता है -



इसके बाद चलते हैं अगले दशक में, जब 1973 में हृषिकेश मुख़र्जी द्वारा निर्देशित नमक हराम फ़िल्म में सोमनाथ (राजेश खन्ना) और विक्रम (अमिताभ बच्चन) की दोस्ती को दर्शाते इस सुमधुर गीत ने मानो दोस्ती को एक नया आयाम दे दिया। गीत आनंद बक्षी का, संगीत - राहुल देव बर्मन का, आवाज़ किशोर कुमार की, गीत - दिए जलते हैं...


नमक हराम जब शुरू हुयी थी तो राजेश खन्ना सुपर स्टार थे और अमिताभ बच्चन एक उभरता हुआ कलाकार, पर जिस वर्ष यह फ़िल्म रिलीज़ हुयी उसे अमिताभ बच्चन का वर्ष कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि 1973 में ही रिलीज़ हुयी ज़ंजीर जिसकी सफलता ने अमिताभ बच्चन को वो ऊंचाइयां बख्शी कि भारतीय सिनेमा का इतिहास ही बदल गया। ज़ंजीर में भी दोस्ती की भावनाओं से भरा एक गीत शेर खान याने प्राण साहब पर फिल्माया गया था, आवाज़ मन्ना डे की, गीत गुलशन बावरा का (जिन्हें इस गीत के लिए BEST LYRICIST का फ़िल्म फेयर अवार्ड भी मिला था) , संगीत कल्याण जी-आनंद जी का। यहाँ गौरतलब बात ये भी है की यह गीत उस साल के बिनाका गीतमाला के वार्षिक पायदान का गीत नम्बर वन भी था :


पर इन सभी गीतों में जो रुतबा 1975 में आई ब्लॉकबस्टर शोले के ये दोस्ती को हासिल है शायद ही किसी और गीत को वह हासिल हो। दोस्ती का एंथम बने इस गीत को गाया था मन्ना डे और किशोर कुमार ने, बोल आनंद बख्शी के और संगीत आर डी बर्मन का:



इसके बाद और ढेर सारी फिल्मों ने दोस्त और दोस्ती के फॉर्मूले को भुनाना चाहा पर दोस्ताना (1980) और याराना (1981) के अलावा कोई फ़िल्म इतनी सफल ना रही, पेश है इन दोनों फिल्म्स के टाइटल गीत :

दोस्ताना (1980) : संगीत लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल , आवाजें - किशोर कुमार और मोहम्मद रफी


याराना (1981) : संगीत - राजेश रोशन, आवाज़ : किशोर कुमार





पर नए मिलेनिम में एक फ्रेश अप्रोच ले कर आई फरहान अख्तर की फ़िल्म दिल चाहता है (2001) ने दोस्ती की नई परिभाषा गढ़ी और फ़िल्म का टाइटल गीत नए ज़माने की युवा पीढी के लिए दोस्ती का नया एंथम बन गया :


इन गीतों के अलावा कुछ और भी गीत हैं जिनमें दोस्ती की मीठी मीठी सी सौंधी महक है, जैसे KK की आवाज़ में ये गीत :


और जूनून के गीत यारों यही दोस्ती है को हम कैसे भूल सकते हैं :


तो ये थे फ्रेंडशिप डे पर मेरे सबसे प्रिय दस दोस्ती गीत, जिन्हें मैं समर्पित करता हूँ अपने सभी दोस्तों को - एहसान मेरे दिल पर तुम्हारा है दोस्तों, ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों !

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक August 2, 2009 at 9:37 PM  

बढ़िया पोस्ट लगाई है।

दोस्ती का जज़्बा सलामत रहे।
मित्रता दिवस पर शुभकामनाएँ।

moon-uddhv April 12, 2010 at 5:13 PM  

दोस्ती पर प्यारे गाने दिए आपने .दो गाने दो बहुत अच्छे लगे .फिल्म दोस्ती और नमकहराम के .
लो जी,हम तों एकदम तैयार हैं,हमें भी शामिल कर लो अपने दोस्तों की जमात में.जब गुस्सा हो जायेंगे तों गायेंगे' मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसते' या ' दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना हर'
जरा सा खुश हुए फट पलटी मार जायेगे,एक मिनट नही लगेगा ये कहते हुए'मेरा तों जो भी कदम है वो तेरी राह में है की तू कहीं भी रहे ,दोस्त मेरी निगाह मे है'
क्योंकि ५७ के जरूर हो गए हम मे आज भी एक प्यारा सा बच्चा जिन्दा है और इतना मासूम है न की इस् दुनिया का हो के भी इस् दुनिया का नही वो.

Anonymous,  December 8, 2012 at 7:06 PM  

Granted, that is certainly partly because there is certainly generally very little closeness or intimacy between two paid performers, along with nature of an sizegenetics film set -- weird lighting, multiple cameras pointing at you, creepy directors barking orders, etc. -- is simply not possibly the most conducive to complete, uninhibited pleasure. With that said, if massive penises were truly magical pleasure rods that could make any woman thrash uncontrollably with little effort, it stands to reason which the female stars in sizegenetics films wouldn't have got to try so hard to appear like they were enjoying the experience.
http://sizegenetics-reviewx.tumblr.com/

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