टिस्का प्लेटफॉर्म पर

>> Saturday, January 31, 2009

नहीं नहीं तारे ज़मीन पर मे ईशान नंदकिशोर अवस्थी की प्यारी सी परेशान मम्मी टिस्का चोपडा किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर नहीं आई हैं। मैं बात कर रहा हूँ बॉलीवुड में उनकी पहली फ़िल्म के विषय में। तारे ज़मीन पर के साथ बॉलीवुड में दूसरी एंट्री करने वाली टिस्का इससे पहले भी दो और नामो के साथ बॉलीवुड में अपनी तकदीर आज़मा चुकी हैं। प्रिया नाम के साथ 1990 में आई फ़िल्म गुलाबी रातें में एक छोटे से रोल के साथ टिस्का ने अपने करियर की शुरुआत की, पर उन्हें सही ब्रेक मिला 1993 में अजय देवगन के साथ, फ़िल्म थी प्लेटफॉर्म। फ़िल्म का एक गीत बड़ा चला था - मैं शमा तू परवाना। खैर गाने चलने के बावजूद न तो फ़िल्म चली, न टिस्का।
आप देखिये फ़िल्म का सबसे चर्चित गीत -


इसके बाद भी प्रिया /टिस्का ने कुछ छोटी बड़ी फिल्मों में छोटे मोटे रोल्स किए, पर तकदीर उनसे रूठी रही। ऐसी ही एक फ़िल्म थी 1994 में आई फ़िल्म बाली उमर को सलाम जिसमें प्रिया ने अपने पूरे नाम प्रिया अरोरा के साथ
नज़र आई कमल सदाना के साथ। फ़िल्म का संगीत था बप्पी लाहिरी का, जो काफ़ी चला मगर फ़िल्म नहीं चली।
फ़िल्म का एक गीत जो खासा चला था -


इसके बाद मणिरत्नम की बॉम्बे और ना जाने ऐसी कितनी फिल्मों में बहुत छोटे छोटे रोल्स निभा कर टिस्का अपने मॉडलिंग करियर पर ध्यान देने लगी। बीच में किए दो तीन टीवी सिरिअल्स पर अब उनका नाम प्रिया या प्रिया अरोरा नहीं टिस्का चोपडा था। फ़िर तो बस टिस्का ने हैदराबाद ब्लूज़ 2 की साथ में की कुछ क्रॉस ओवर फिल्में और Olay का विज्ञापन करके बन गई घर घर में जाना पहचाना नाम।
सफलता अब अधिक दूर नहीं थी। तारे ज़मीन पर में ईशान की परेशान माँ माया अवस्थी का किरदार निभा कर टिस्का बन गई हैं देश की सबसे चहेती माँ।

प्लेटफॉर्म से तारों तक का ये सफर आसान तो बिल्कुल नहीं रहा होगा, पर टिस्का की मुस्कान सारे संघर्षों को धता बताती वैसी की वैसी है, जैसी तब हुआ करती थी।

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इमोसनल अत्याचार और हमारे फिल्मकार

>> Friday, January 9, 2009

इन दिनों अनुराग कश्यप की फ़िल्म – देव-डी का गीत – इमोसनल अत्याचार मुझे काफ़ी पसंद आ रहा है…इसके ब्रास बैंड वाले वर्ज़न को सुन कर सर्दियों में होनेवाली उत्तर भारतीय शादियों - बरातों की यादें बरबस ताज़ा हो जाती है…और आजकल के बाकी धूम धड़ाकेदार गीतों से हट कर इसके बोल कुछ ऐसे मजेदार हैं की ये गीत पिछले हफ्ते से मेरे आई- ट्यून्स पर सर्वाधिक प्ले किए गीतों की लिस्ट में बना हुआ है…
आज यूँ ही मस्ती में ये गीत सुनते हुए जब मैंने इसके बोलों पर ध्यान दिया तो मुझे इस गीत में इसके निर्देशक अनुराग कश्यप का दर्द और उन पर हुए इमोशनल अत्याचार की झलक भी नज़र आई. अब मेरा ये सोचना किस हद तक सही है ये या तो अनुराग जी जानते हैं या इस गीत के गीतकार –



गीत देखिये और जो मैंने नोटिस किया उस पर गौर फरमाइए…(और बताइए आप क्या सोचते हैं?)
गीत के शुरुआत की लाईनें हैं - एक दो तीन चार…..छै…
मैंने सोचा इसमें से पाँच कहाँ गया…और याद आया बेचारे अनुराग जी की फ़िल्म पाँच ना जाने कब से डब्बा बंद है..और ना जाने ये कभी किसी थियेटर का मुंह देख भी पाएगी या नहीं…सो शायद इसलिए गीत की शुरुआत की गिनती में से भी पाँच का ज़िक्र उन्होंने निकाल दिया है…

फिर गीत में आगे एक पंक्ति और आती है – ये दिल पिघला के साज़ बना लूँ, धड़कन को आवाज़ बना लूँ, स्मोकिंग स्मोकिंग निकले रे धुंआ…

हम सभी को याद है की अनुराग की पिछली फ़िल्म नो स्मोकिंग थी और उसका क्या हश्र हुआ था…शायद इसीलिए वे इस लाइन के आगे कहते हैं

सपने देखे जन्नत के पर मिटटी में मिल जाएँ..

अपने पर हुए इस इमोशनल अत्याचार को बैंड बाजे के साथ गाने का अंदाज़ निराला अवश्य है…पर ये कोई नई बात नहीं कि ख़ुद की सफल/असफल फिल्मों को याद करके गाने बनाये जाएँ…
जब बात गानों में नए प्रयोग करने की हो, तो शोमैन राज कपूर हमेशा बाज़ी मार ले जाते हैं (इस पर एक विस्तृत पोस्ट करीब करीब तैयार है और जल्द ही इस चिट्ठे पर पोस्ट करूँगा) , जहाँ अनुराग ने इस एमोसनल अत्याचार को बैंड बाजे के साथ प्रस्तुत किया है, राज साहब ने अपनी दुःख भरी दास्ताँ पेश की थी एक दर्द भरे नगमें में अपनी फ़िल्म आवारा में.
गीत था – हम तुझसे मोहब्बत करके सनम, रोते भी रहे हँसते भी रहे…



याद कीजिये गीत की ये पंक्तियाँ –

ये दिल जो जला एक आग लगी…आंसू जो बहे बरसात हुयी…
बादल की तरह आवारा थे हम…रोते भी रहे हँसते भी रहे…

यदि आपको याद हो तो राज साहब कि बतौर निर्माता-निर्देशक पहली फ़िल्म थी – आग जो बड़ी बुरी तरह फ्लॉप हुयी थी, आग की असफलता से उनके आंसू बहे या नहीं ये तो पता नहीं मगर दूसरी फ़िल्म बरसात की अपार सफलता ने राज साहब को सातवें आसमान पर ला बिठाया…गौरतलब बात ये है कि बरसात की पटकथा और संवाद लिखे थे रामानंद सागर जी ने . आवारा राज साहब की तीसरी फ़िल्म थी जो बरसात से भी कहीं बड़ी हिट साबित हुयी…फिल्मकार मित्र राज के इस फिल्मी सफर को शैलेन्द्र जी की कलम ने इस गीत में बयान कर दिया.

(वैसे आवारा मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से एक है…कभी इस पर विस्तार से चर्चा करने का मन है इस चिट्ठे पर)

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देशभक्ति के बहाने भारत विरोध : जागृति(१९५४) की पाकिस्तानी नक़ल बेदारी (१९५७)

>> Thursday, January 8, 2009

पिछले दिनों Youtube पर भटकते भटकते अचानक एक गीत पर नज़रें टिकी - आओ बच्चों सैर कराएं तुमको पाकिस्तान की... मुझे बड़ी खुशी हुयी यह सोच कर कि चलो इस गाने के बहाने अपने पड़ोसी मुल्क के कुछ दर्शनीय स्थलों की झाँकी देख ली जाए. विडियो देख कर खुशी होने की जगह मन में एक अजीब सा गुस्सा और नफरत हुयी कि पाकिस्तान के लिए देशभक्ति का मतलब है अपने पड़ोसी भारत कि सहृदयता का नाजायज़ फ़ायदा उठा कर दर्शकों को भारत विरोधी विचार दिखाए जाएँ, वह भी एक ऐसी फ़िल्म के मध्यम से जो स्वयं एक भारतीय फ़िल्म की बेशर्म नक़ल है, यहाँ तक कि इसका संगीत भी पूरी तरह १९५४ में आई भारतीय फ़िल्म जागृति की नक़ल है.
जिस तरह अपने दौर में जागृति भारतीय बाल फ़िल्म दर्शकों के मन में एक गहरी छाप छोड़ गई वैसी छाप इस फ़िल्म ने पाकिस्तानी बाल दर्शकों के मन में ना ही डाली होती तो बेहतर था मगर आज के दौर और माहौल को देख कर लगता है कि ऐसी भड़काऊ फिल्मों/फ़िल्म संगीत ने देशभक्ति के नाम पर उन दर्शकों के मन में जो विषबीज बोए हैं वे आज एक विकराल वृक्ष बन कर हमारे देश के प्रति उनकी बदनीयती के रूप में फल-फूल रहा है...

समय निकाल कर ज़रा इन गानों को देखिये और देखिये कि किस तरह ना केवल ऐतेहासिक तथ्यों को तोडा मरोड़ा गया है बल्कि भारत विरोधी विचार किस तरह शहादत और संघर्ष की कड़वी चाशनी में लपेट कर प्रस्तुत किए गए हैं.
गाना १
आओ बच्चों सैर कराएं तुमको पाकिस्तान की : बेदारी (नक़ल)
ज़रा पंक्तियों पर गौर फ़रमाएँ : बंदूकों की छाँव में बच्चे होते हैं जवान यहाँ (अब ऐसे में उस देश से कसब और उसके जैसे अन्य बच्चे आतंकवादी ना बनें तो और क्या बनेंगे जिस देश में बदूकों की छांव में जवान होना शान की बात हो)

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झाँकी हिन्दुस्तान की : जागृति (असल)

गौर कीजिये बाल मन की कोमलता को ध्यान में रख कर देश की सांस्कृतिक और ऐतेहासिक झाँकी का कैसा मासूम चित्रण किया है पंडित प्रदीप ने.

गाना
हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के : बेदारी (नक़ल)


देशभक्ति के नाम पर जातिवाद और नफरत के साथ साथ कश्मीर पर बेजा कब्ज़ा करने की साजिश किस खूबी के साथ इस गीत में प्रस्तुत की गई है उनकी बानगी इन पंक्तियों में छलक छलक कर नज़र आती है -
दुनिया की सियासत के अजब रंग हैं प्यारे, चलना हैं मगर तुमको कुरान के सहारे .
और
लेना अभी कश्मीर है ये बात न भूलो, कश्मीर पर लहराना है झंडा उछाल के (आपने कभी अपने बच्चों को उन चीज़ों को हथियाने की शिक्षा ना दी होगी जिन पर उनका अधिकार नहीं मगर पाकिस्तान में ये शिक्षा का एक अहम् पहलू नज़र आता है इस गीत में सलीम राजा के एक्सप्रेशंस देख कर)
हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के :जागृति (असल)


ध्यान दीजिये प्रदीप जी की बच्चों को नसीहत और सीख पर -
दुनिया के दांव पेंच से रखना न वास्ता मंज़िल तुम्हारी दूर है लंबा है रास्ता (इस पंक्ति का पाकिस्तानी वर्ज़न ऊपर दिए गीत में आपने देखा ही होगा)।
और
उठो छलाँग मार के आकाश को छू लो, तुम गाड़ दो गगन पे तिरंगा उछल के (हमें अपना आसमान चाहिए किसी अन्य देश की ज़मीन पर नाजायज़ कब्ज़ा नहीं)
इन गीतों को देख कर साफ़ हो जाता है कि आख़िर क्यों उनके यहाँ आतंकवादी बन रहे हैं और हमारे यहाँ चंद्रयान? बोए पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए?

गाना
यूँ दी हमें आज़ादी : बेदारी (नक़ल)


इस गीत में तो तथ्य कुछ ऐसे तोड़ मरोड़ दिए गए कि सोच कर ही डर लगता है कि पाकिस्तान में विद्यार्थियों को इतिहास में न जाने क्या पढ़ाया जाता होगा?

ज़रा पंक्तियों पर गौर देने के साथ दृश्यों को अवश्य देखें -

हर चाल से चाह तुझे दुश्मन ने हराना (यहाँ इस्तेमाल में लायी गई है एक स्टॉक फुटेज जिसमें महात्मा गांधी जिन्ना के साथ मुस्कुराते नज़र आते हैं, गाँधी जी उनके दुश्मन हैं और उनकी मुस्कान एक चाल? )

मारा वो दाँव तुने कि दुश्मन भी गए मान - यहाँ स्टॉक फुटेज में गाँधी जी जिन्ना विदा लेते हुए हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं किंतु उसका कुछ और ही मतलब निकलती हैं ये पंक्तियाँ ।

यदि यह पकिस्तान का इतिहास है तो जिन्ना ने अपनी मृत्युशय्या पर पाकिस्तान को अपनी सबसे बड़ी गलती स्वीकारते हुए कुछ ग़लत नहीं किया ।


दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल : जागृति (असल)


अब इस गीत का वर्णन क्या किया जाए हम सबने इस गीत को अनगिनत बार सुना और गाया है ।


भारत में भी इस दशक के शुरुआत में कुछ पाक विरोधी फिल्में बनी हैं किंतु कभी पाकिस्तान पर इस तरह तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर हमला नहीं किया हिन्दी फिल्मकारों ने । हमने सदा उनके कलाकारों और फिल्मकारों को अवसर दिया है कि वे हमारे देश में आ कर अपनी कला का प्रदर्शन करें... परन्तु क्या इस तरह फिल्मों के नाम पर बाल मनोमस्तिष्क में नफरत के विषबीज बोना पाकिस्तान में कभी बंद होगा?











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