Altaf Raja: the T3P Man

>> Saturday, June 1, 2013


Well I used to run a Facebook group called Altaf Bhai The Real Rockishtaar! and I am one of the only 3 members there (Its a invites only page, and no one is offering or accepting any invites for all these years - look at the EXCLUSIVITY in this age of Like-scoring and Members Poaching). Its like The Phantom's Skull cave we've created in our own Denkali called Facebook, and we love it that way.

Why this exclusivity? Well Altaf raja’s music is an acquired taste, its not meant for people with weaker heart and are into low IQ music, because it needs refined taste to understand the musical genius of Altaf Raja.

Though we can discuss almost every great song by the maestro, but it will be unfair because its Tum Toh Thehre Pardesi or T3P (a term coined by our very own Abhay Chauhan) is something that’s still afresh in collective consciousness. After all T3P is the Seed of Great Music:

Music begins from T3P and it ends there - the song is like a complete circle - an entwined yin and yang of music, an ocean of inspiration for generations of musicians. Can you believe they just took a drop from the ocean that T3P is and created one of the most successful songs of our time?

Mulahija Farmaaiye -



Sounds familiar, now try this -



This is the beauty of Altaf Bhai's music, he envisages a world without boundaries and its so universal, that you put any visuals over his song and the visuals would fit the song to a T, take for an example this video from Gulzar's overrated album Sunset Point, which suits Tum Toh Thehre Pardesi more than the original obscure song - Aasmani Rang it was supposedly shot for. Check Out (Stats say its recall value is 1:299 as compared to T3P) -

T3P here


and

Aasmani Rang hère -


(Personal confession: Thanks to this fan made T3P video and its accuracy to Altaf Bhai's poignant voice, for a long time I used to think it was Altaf Bhai, who gave break to Chitrangada Singh and Sanjay Suri, the realization came in late and it was heartbreaking, imaan se).

The Repeat Value - The song definitely has its repeat value, its so Repeat-able that every single line is repeated several times in the song itself.

Also, ALA John Lenon's Imagine T3P is a deeply political song and BJP realised its potential when they bought the rights and used it against a certain Pardesi National Leader during the Lok Sabha elections in 90s.

You can't really ignore the social aspect of the song as well. It oozes with the proud feeling of Being Swadeshi and IMHO this was the first time entire India, (which is otherwise blinded with Phoren ka maal and imported items) teemed with the proud feeling of being an Indian, a Swadesi and looked at Pardesi with a contempt. I think this disdain towards Pardesi is second only to the Swadesi Movement of the 1905.

Not only social and political context, but Altaf Bhai and his awesome music touches every aspect and emotion ever conceived by the humanity. Have a look at his homage to the Gregorian Calendar with power-packed lyrics like -

Jab Tumse Itefaakan meri Nazar Mili Thi
ab Yaad Aa Raha Hain shayad Woh Janwary Thi
Tum Yu Mili Dubara phir Maahe Farwary Mein
Jaise Ke Hamsafar Ho tum Raahein Zindagi Mein
Kitna Hasi Zamana, aaya Tha March Lekar
Raahein Wafa Pe Thi Tum waadon Ki Torch Lekar

and the song goes on till Altaf Bhai tries to make his lover understand the concept of Time Lapse, singing -

Lekin Yeh Kya Batau Ab Haal Dusra Hain
arey Woh Saal Dusra Tha Yeh Saal Dusra Hain

But having a keen interest in UFOs and Alien Abduction I strongly believe it can also be an ode to the Missing Time theory as well. At times I feel this song is so deep and has such Robert Langdon-isque mysterious subtexts to it, that I am sure some hack paperback scribe would see the hidden potential here and write a novel - The Raja Code.

And mind you, we are just talking about one Altaf Raja song here, the album itself is full of gems like - Dono Hi Mohabbat Ke Jazbaat Mein Jalte Hain, in which Altaf Bhai tries to create an awareness about the deadly effects of somnambulism with lines like - Chhat Par Na Sula Dena, Hum Neend Mein Chalte Hain (Don't make me sleep on the terrace, I sleepwalk). But Altaf Bhai never stoop down to market himself as a social messiah unlike a certain Perfectionist Filmmaker who made a film that tried to create an awareness about Dyslexia.

I can go on and on and discuss his music and how it changed lives, but word-count naam ki bhi koi cheez hoti hai, so I think I should stop here.

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गुलज़ार और इब्न बतूता के जूते के बहाने

>> Wednesday, January 27, 2010

हाल ही में कहीं से लौटना हो रहा था और कार में ठसाठस बैठे हम सब ऍफ़ एम् रेडियो में बज रहे बेसुरे गानों और unimaginative विज्ञापनों से त्रस्त बातों को फूटबाल की तरह एक दिशा से दूसरी दिशा में ले जा रहे थे कि अचानक रेडियो पर विशाल भारद्वाज के संगीत में गुलज़ार साहब के बोल गूँज उठे - " इब्न बतूता ता ता ता..."
रेडियो और टीवी से एक लम्बे अरसे से दूरी बनाई हुयी है  मैंने, सो जहां बाकी के लोग गीत के साथ गुनगुना रहे थे वहीँ मैं इसे पहली बार सुन कर सोच में पड़ गया कि क्यों ये पंक्तियाँ ज़रा सुनी सुनी सी लग रही हैं, फिर याद आई बचपन में पराग में पढ़ी  सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की बाल-कविता बतूता का जूता. अरे हाँ! ये वही पंक्तियाँ तो हैं करीब करीब!
गुलज़ार साहब ने फिर से कहीं से इंस्पिरेशन ले एक मजेदार गीत रच डाला. अब तक बात बुल्ले शाह, ग़ालिब और खुसरो की पंक्तियों तक ही थी, पर सक्सेना जी की बाल कविता को एक नया टेक देना और उसे जनमानस में फिर से लोकप्रिय बनाना मानो एक खूबसूरत वेबपेज  को रिफ्रेश करके नए सिरे से देखने जैसा है...

इन ख्यालों में मैं खोया ही था कि बाजू से आवाज़ आई, "What does Ibn Battuta Means??"
और किसी ने जवाब दिया, "arre isn't it that shopping mall in Dubai...where we shopped last time?"

मैंने सर पीट लिया कि १३वीं सदी के महान यात्री और विद्वान् इब्न बतूता को याद रखने के लिए अब हमें गुलज़ार साहब के गाने और दुबई के shopping mall की ज़रूरत पड़ने लगी? बाद में ज़रा सी खोज से पता लगा उस माल में भी इब्न बतूता पर एक Interactive Display लगा हुआ है, काश उन्होंने वहाँ सिर्फ shopping ना करके वहाँ लगे इब्न बतूता के इस Interactive Display को भी देखा होता? कई बार कुछ खूबसूरत चीज़ें हमारी नज़रों के सामने ही होती हैं पर हमारी नज़र उन पर नहीं पड़ती क्योंकि हम किन्हीं और बातों में इतने खोये होते हैं कि हमें और कुछ नज़र ही नहीं आता, अगली बार इन्टरनेट को थोड़ी देर का ब्रेक दे कर अपने पिताजी के बचपन के किस्से सुन कर देखिएगा बड़ा आनंद आएगा ठीक वैसे ही जैसे इस गीत को सुन कर मुझे बचपन में पढ़ी इस बाल-कविता को याद करके आया.


इब्न बतूता का जूता - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में


कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता


उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।

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डिस्नी ने खरीदा मार्वेल

>> Tuesday, September 1, 2009

मैं आज दोपहर डिस्नी इंडिया के ऑफिस में बैठा हुआ अपने पुराने सहकर्मियों के साथ बातें ही कर रहा था कि इस बड़ी ख़बर की उद्घोषणा हुयी डिस्नी ने मार्वेल कॉमिक्स को टेकओवर कर लिया है, वह भी पूरे चार बिलियन अमेरिकन डॉलर्स में। याने पता नहीं कब आपको मिकी माउस की कहानी में स्पाईडी की झलक मिल जाए या किसी फ़िल्म में डोनाल्ड डक और हॉवर्ड डक गलबहियां डाले घूमते नज़र आयें।

मजाक दरकिनार रखते हुए मैं बताना चाहूँगा कि एक कंपनी के तौर पर डिस्नी ने इससे पहले भी कई ऐसे टेकओवर्स किए हैं जिन्हें देख कर लोगो ने दाँतों तले उंगलियाँ दबा ली थी। यदि मैं आपसे कहूँ डिस्नी ने क्विनटीन टेरेंटिनो की सभी फिल्में जैसे कि पल्प फिक्शन इत्यादि का निर्माण किया है या कहूं कि कई अडल्ट शोज़ जैसे डेस्परेट हाउसवायिव्ज़, lost या Ugly Betty इत्यादि भी डिस्नी द्वारा निर्मित हैं तो क्या आप यकीन करेंगे? जी हाँ यह बिल्कुल सच है क्योंकि डिस्नी ने मनोरंजन के किसी भी रूप को नई दिशा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी और यही कारण है कि कई बड़ी कंपनियाँ जैसे कि Touchstone, MIRAMAX या abc, espn इत्यादि डिस्नी के अर्न्तगत आने वाली कई कम्पनियों में से कुछ एक हैं। डिस्नी को सिर्फ़ एनीमेशन या बच्चों के लिए बनने वाले कार्यक्रमों वाली कंपनी समझने की भूल हम सब करते हैं पर डिस्नी दरअसल जैसी दिखती है उससे कहीं ज़्यादा विस्तृत कंपनी है। और इस अति विस्तृत कंपनी का हिस्सा बन कर मार्वेल कॉमिक्स अब कैसी ऊँचाइयाँ छुयेगी ये तो आनेवाला समय ही बताएगा पर फिलहाल इस ख़बर से मीडिया जगत के बड़े बड़े दिग्गजों की नींदें उड़ गई हैं।
विस्तृत समाचार के लिए इन लिंक्स पर जाएँ :
Hollywood Reporter
Comic Book Resources

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दोस्त, दोस्ती और सिनेमा

>> Sunday, August 2, 2009

आज के दिन को या कि कहें अगस्त के पहले रविवार को पूरे विश्व में फ्रेंडशिप डे या मित्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। एस एम् एस ने हमारे जीवन को कुछ इस तरह से आरामदेह बना दिया है कि एक ही मेसेज जो कि आपको भी किसी और ने भेजा है के साथ ज़रा सी फेरबदल करके आप उसे सेंड ऑल करके सभी दोस्तों को एक साथ फ्रेंडशिप डे की शुभकानाएं दे कर अपना सन्डे मज़े से बिता सकते हैं। खैर दोस्तों और दोस्ती की बात हो और सिनेमा के रुपहले परदे पर दिखाई गई दोस्ती की बात ना हो ऐसा तो हो नहीं सकता। मैंने सोचा आज फ्रेंडशिप डे पर एक विशेष पोस्ट लिखी जाए जिसमें मेरे पसंदीदा दोस्ती गीतों के साथ साथ हम यह दिन सेलिब्रेट करें, आइये शुरू करते हैं 1964 में आई राजश्री बैनर के तले बनी फ़िल्म दोस्ती के टाइटल ट्रैक के साथ, सुधीर कुमार (जिन्होंने अंधे मोहन की भूमिका अदा की थी) और सुशील कुमार के अभिनय से सजी इस लो बजट फ़िल्म ने उस वर्ष सफलता के झंडे गाडे थे और उसके सफल होने के पीछे बहुत बड़ा कारण लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का सुमधुर संगीत भी था, जिसके लिए उन्हें उनका सबसे पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड भी हासिल हुआ था, जबकि उनका मुकाबला उस वर्ष के दिग्गज संगीतकारों शंकर जयकिशन (संगम) के साथ था। आवाज़ मुहम्मद रफी की, तर्ज़ लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की और बोल मजरूह सुल्तानपुरी के :



इसके बाद पेश है मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गबन पर आधारित कृशन चोपडा और हृषिकेश मुख़र्जी द्वारा निर्देशित फ़िल्म गबन (1966) का यह गीत। फ़िल्म गबन कुछ ख़ास सफल नहीं हुयी पर शंकर जयकिशन के संगीत से सजा उसका यह गीत बड़ा ही मधुर है, जिसमें नायक रामनाथ (सुनील दत्त) अपने दोस्तों की दोस्ती से कुछ इस तरह प्रभावित है कि मोहम्मद रफी की आवाज़ में वह गुनगुना उठता है -



इसके बाद चलते हैं अगले दशक में, जब 1973 में हृषिकेश मुख़र्जी द्वारा निर्देशित नमक हराम फ़िल्म में सोमनाथ (राजेश खन्ना) और विक्रम (अमिताभ बच्चन) की दोस्ती को दर्शाते इस सुमधुर गीत ने मानो दोस्ती को एक नया आयाम दे दिया। गीत आनंद बक्षी का, संगीत - राहुल देव बर्मन का, आवाज़ किशोर कुमार की, गीत - दिए जलते हैं...


नमक हराम जब शुरू हुयी थी तो राजेश खन्ना सुपर स्टार थे और अमिताभ बच्चन एक उभरता हुआ कलाकार, पर जिस वर्ष यह फ़िल्म रिलीज़ हुयी उसे अमिताभ बच्चन का वर्ष कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि 1973 में ही रिलीज़ हुयी ज़ंजीर जिसकी सफलता ने अमिताभ बच्चन को वो ऊंचाइयां बख्शी कि भारतीय सिनेमा का इतिहास ही बदल गया। ज़ंजीर में भी दोस्ती की भावनाओं से भरा एक गीत शेर खान याने प्राण साहब पर फिल्माया गया था, आवाज़ मन्ना डे की, गीत गुलशन बावरा का (जिन्हें इस गीत के लिए BEST LYRICIST का फ़िल्म फेयर अवार्ड भी मिला था) , संगीत कल्याण जी-आनंद जी का। यहाँ गौरतलब बात ये भी है की यह गीत उस साल के बिनाका गीतमाला के वार्षिक पायदान का गीत नम्बर वन भी था :


पर इन सभी गीतों में जो रुतबा 1975 में आई ब्लॉकबस्टर शोले के ये दोस्ती को हासिल है शायद ही किसी और गीत को वह हासिल हो। दोस्ती का एंथम बने इस गीत को गाया था मन्ना डे और किशोर कुमार ने, बोल आनंद बख्शी के और संगीत आर डी बर्मन का:



इसके बाद और ढेर सारी फिल्मों ने दोस्त और दोस्ती के फॉर्मूले को भुनाना चाहा पर दोस्ताना (1980) और याराना (1981) के अलावा कोई फ़िल्म इतनी सफल ना रही, पेश है इन दोनों फिल्म्स के टाइटल गीत :

दोस्ताना (1980) : संगीत लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल , आवाजें - किशोर कुमार और मोहम्मद रफी


याराना (1981) : संगीत - राजेश रोशन, आवाज़ : किशोर कुमार





पर नए मिलेनिम में एक फ्रेश अप्रोच ले कर आई फरहान अख्तर की फ़िल्म दिल चाहता है (2001) ने दोस्ती की नई परिभाषा गढ़ी और फ़िल्म का टाइटल गीत नए ज़माने की युवा पीढी के लिए दोस्ती का नया एंथम बन गया :


इन गीतों के अलावा कुछ और भी गीत हैं जिनमें दोस्ती की मीठी मीठी सी सौंधी महक है, जैसे KK की आवाज़ में ये गीत :


और जूनून के गीत यारों यही दोस्ती है को हम कैसे भूल सकते हैं :


तो ये थे फ्रेंडशिप डे पर मेरे सबसे प्रिय दस दोस्ती गीत, जिन्हें मैं समर्पित करता हूँ अपने सभी दोस्तों को - एहसान मेरे दिल पर तुम्हारा है दोस्तों, ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों !

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>> Friday, May 29, 2009

मूक फिल्मों के दौर में हिंदी फिल्म जगत के जनक दादा साहब फाल्के द्वारा बनाई गयी एनीमेशन फिल्म आगकाड्याचा मौज (१९१७) से ले कर दूरदर्शन पर आनेवाली स्विम्मी मछली की कहानी, एक चिडिया और वहाँ से आज के दौर में निक/NICK पर प्रसारित हो रहे लिटिल कृष्णा (भारतीय स्टूडियो बिग एनीमेशन द्वारा बनायीं प्रथम हाई एंड 3D टीवी सीरीज़) तक भारतीय एनीमेशन ने एक बहुत बड़ा सफ़र तय किया है। नवीनतम टेक्नोलॉजी की मदद से फैंटेसी और एडवेंचर्स से भरी कहानियों वाली इस सीरीज़ के साथ भारतीय एनीमेशन ने सफलता का उत्साहजनक नया आयाम गढा है, वहीं अंतर्राष्ट्रीय एनीमेशन के मंच पर भारतीय एनीमेशन का सच्चा सफर अब शुरू होता नज़र आ रहा है और लिटिल कृष्णा को इस दिशा मे बढ़ा पहला कदम कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी।

सपनों को साकार करना हर किसी का उद्देश्य होता है और एनीमेशन की दुनिया की शुरुआत ही सपनों को हकीक़त में बदलने से होती है। एनीमेशन वह कला है जो कल्पनाओं की उड़ान को तकनीक के पंख दे कर एक ऐसा स्वप्नलोक रचने में मदद करती है जिसकी कल्पना दर्शकों ने भी कभी न की हो और यही वजह है कि दर्शकों ने एनीमेशन फिल्मों को सदा हाथों हाथ लिया है।

मनोरंजन के माध्यम के रूप में एनीमेशन एक लंबे समय से भारतीय दर्शकों का मन बहलाता रहा है और एक इंडस्ट्री के रूप में एनीमेशन अपने पुराने आदिम स्वरुप से मुक्त हो कर आज एक नए अवतार के साथ हमारे सामने है। PWC और Cygnus Research के मुताबिक भारत में एनीमेशन, VFX और गेमिंग इंडस्ट्री 25% की दर से बढ़ रही है और 2012 तक भारतीय एनीमेशन चालीस मिलियन अमेरिकी Dollars की इंडस्ट्री बन चुका होगा।

बिग एनीमेशन के CEO आशीष S.K.कहते हैं, " भारतीय संस्कृति मे कहानियों को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और हमारे संस्कारों में इन कहानियों की जड़ें इतनी गहरी और मज़बूत हैं कि उन कहानियों के बिना हमारी संस्कृति और सभ्यता का इतना मुखर हो पाना असंभव था. भारतीय एनीमेशन इन कहानियों को ना केवल जीवित रख रहा है बल्कि आनेवाली पीढियों को भी हमारी सांस्कृतिक विरासत से परिचित करा रहा है।"

आज एनीमेशन इंडस्ट्री एक उत्साहजनक भविष्य की ओर अग्रसर है क्योंकि आज का मुख्य दर्शक वर्ग, युवाओं का एक ऐसा जागरूक वर्ग है जिसके लिए मनोरंजन के माध्यम से कहीं अधिक मनोरंजन का यूनिक होना मायने रखता है और ऐसे में एनीमेशन उनकी इस आवश्यकता को पूरा करने में एक बड़ी भूमिका निभाने को तैयार है। इस तरह अब एनीमेशन सिर्फ़ बच्चों के मनोरंजन तक सीमित न रह कर हर आयुवर्ग के दर्शक को लुभाने में सक्षम है।

एनीमेशन अब सिर्फ़ मनोरंजन का साधन न रह कर कम्युनिकेशन के सरलीकरण का भी माध्यम बन चुका है। मेडिकल साईंस हो या इंजीनियरिंग, अंतरिक्ष रिसर्च हो या अन्य कोई भी इंडस्ट्री, सभी में एनीमेशन की मदद ली जा रही है। जहाँ एक तरफ़ चारों ओर से आती एनीमेशन की आवश्यकता को नकारना असंभव है, वहीं आज के दर्शक वर्ग का रुझान अंतर्राष्ट्रीय स्तर के एनीमेशन की ओर होने की वजह से भारतीय एनीमेशन की अंतर्राष्ट्रीय स्तर के एनीमेशन से तुलना होना भी नकारा नहीं जा सकता।

भारतीय एनीमेशन इंडस्ट्री एकजुट हो कर इस कड़ी चुनौती का सामना करने को तैयार हो रही है, जहाँ एनीमेशन इंडस्ट्री से जुड़े लोग अपनी क्षमताओं और कला को तराश कर उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बनाने में जुटे हैं वहीं BIG AIMS (www.bigaims.in, BIG Animation (I) Pvt. Ltd. का उपक्रम) जैसे संस्थान की शुरुआत को भारतीय एनीमेशन की दुनिया में एक सुखद/क्रांतिकारी पहल कहा जाए तो ग़लत ना होगा। BIG AIMS के एडवांस कोर्सेस में एनीमेशन के विद्यार्थियों को ना केवल एनीमेशन के बेसिक्स का बुनियादी ज्ञान दिया जाता है वरन उन तकनीकी और कलात्मक पहलुओं पर भी बारीकी से प्रकाश डाला जाता है जिनके बिना आज की चुनौती भरी एनीमेशन की दुनिया में कदम रखना संभव नहीं। BIG AIMS को और भी विश्वसनीय बनाता है उसका BIG Animation जैसे अग्रणी एनीमेशन स्टूडियो से सम्बद्ध होना। यहाँ विद्यार्थियों के लिए Quad Core Workstations, 5.1 Dolby Digital Auditorium, डिजीटल आर्ट के लिए Cintiq Machines, High Resolution Projector Classroms जैसी कई विश्वस्तरीय सुविधायें भी उपलब्ध हैं ताकि उनकी प्रतिभा का सही दिशा में विकास हो। ये सारी सुविधायें उनको एनीमेशन की बारीकियां सीख कर अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों पर खरा उतरने में सहायक होंगी।

BIG AIMS में कला और विज्ञान के इस अनूठे संगम की यह शिक्षा और भी विशेष बन जाती है क्योंकि यहाँ यह शिक्षा दे रहे हैं लिटिल कृष्णा के निर्माण से जुड़े वे लोग जिनकी प्रतिभा का लोहा सबने माना है। BIG AIMS का सबसे बड़ा लक्ष्य है सही तरीके से प्रतिभाओं का चयन और उनका विकास ताकि आनेवाले समय में भारतीय एनीमेशन विश्व एनीमेशन के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चल सके और स्वदेशी प्रतिभाओं की अंतर्राष्ट्रीय एनीमेशन इंडस्ट्री में भरपूर मांग हो।

भारतीय एनीमेशन में नए ओरिजनल कॉन्टेंट और आई पी क्रियेशन की ओर भी रुझान बढ़ रहा है, जिसके साथ ऐसे प्रशिक्षित लोगों की कमी महसूस होने लगी है, जो इनको वह स्वरुप दे सकें जो अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों पर पूरी तरह से खरा उतर सके और भारतीय एनीमेशन को एक नया आयाम दें।

भारतीय एनीमेशन इंडस्ट्री आज एक नए उत्साह के साथ कदम बढ़ा रही है एक उज्जवल भविष्य की ओर जहाँ सपनों को कला और कल्पनाओं के इन्द्रधनुषी पंख उस ऊंची उड़ान पर ले जाने को तैयार हैं जहाँ हकीक़त और सपनों को अलग करती वह अदृश्य रेखा धुंधली होते होते कहीं दूर क्षितिज में विलीन सी हो गई है।

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स्लमडॉग, सवाल जवाब और होली

>> Thursday, March 12, 2009

Slumdog Millionaire के ऑस्कर जीतने के बाद हाल ही में किसी समाचार पत्र में मैंने एक सवाल देखा कि हमारे देश में स्वदेसी फ़िल्म मेकर्स ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनाते? फिर पता चला कि दरअसल Johnny Gaddar वाले श्रीराम राघवन को इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने का मन था पर तब तक Q & A के अधिकार चैनल 4 ने खरीद लिए थे। वरना राघवन ने ये फ़िल्म बनाई होती और चाहे जितनी भी बेहतरीन बनाई होती ऑस्कर की छोडिये उन्हें एक चिंदी सा फ़िल्मफेयर अवार्ड भी नसीब न होता। खैर ये एक बहस का मुद्दा है और मैं बहस के मूड में नहीं। मैं सोच रहा हूँ Q & A बॉलीवुड में ना भी बनी हो तो भी अपने यहाँ ज्वलंत मुद्दों पर प्रश्न उठाती फिल्मों की कोई कमी नहीं, और फिल्मों में ज्वलंत प्रश्न पूछने वाले चरित्रों की कोई कमी नहीं।
आज बैठे बैठे मैंने सोचा तो पाया कि प्रश्नचिन्ह या अंग्रेज़ी में कहें तो Question Mark वाली ढेर सारी फिल्में बनी हैं अपने यहाँ - ये आग कब बुझेगी? , आख़िर क्यों?, जाने होगा क्या?, वो कौन थी?, कब? क्यों? और कहाँ? (बाकी के नाम काफ़ी सी ग्रेड हैं, और मेरा ब्लॉग बाल-बच्चेदार लोगों के अलावा बाल बच्चे भी पढ़ते हैं सो उनके नाम यहाँ ना ही लिखे जाएँ तो बेहतर है) । खैर अगर बात की जाए प्रश्नों की तो मेरे विचार में गब्बर सिंह का स्थान बाकी चरित्रों से कहीं ऊंचा होगा। ज़रा सोच कर देखिये कितने चरित्रों का Intro Dialogue एक प्रश्न से शुरू हुआ है? गब्बर का आगमन ही एक सवाल से होता है - 'कितने आदमी थे?'
और उसके बाद तो गब्बर ने प्रश्नों की बौछार ही कर दी -
कितना इनाम रक्खे है सरकार हम पर?
क्या सोचा था सरदार खुस होगा? साब्बासी देगा...क्यों?
इस
बन्दूक में कितनी गोलियाँ हैं?
तेरा क्या होगा कालिया?
होली कब है ? कब है होली?
ये रामगढ वाले अपनी छोकरियों को किस चक्की का आटा खिलाते हैं रे?
'कालिया तो कहता था दो हैं? कहाँ है रे फौजी नम्बर दो?

हिन्दी फ़िल्म इतिहास में शायद ही किसी विलन ने एक ही फ़िल्म में इतने सवाल किए होंगे। मगर शोले में सिर्फ़ विलन ने सवाल किए हों ऐसा नहीं। हमारे हीरो लोगो ने भी काफ़ी सवाल किए थे -
'क्या बोलता है पार्टनर?'
'तुम्हारा नाम क्या है बसंती?' वगैरह।

चरित्र कलाकार मेरा मतलब कैरेक्टर आर्टिस्ट्स भी क्यों पीछे रहते सो A.K.हंगल साहब ने अपनी कांपती आवाज़ में सवाल पूछ लिया - इतना सन्नाटा क्यों है भाई?
जूनियर कलाकारों के हिस्से भी सवाल भरे संवाद आए थे इस फ़िल्म में, याद है उस भोले भाले ग्रामीण के सवाल?
अरे भाई ये सुसाइड क्या होता है ?
ये गुड बाई क्या होता है?
मगर अँगरेज़ लोग जाते कहाँ हैं?

वीरू का विवाह प्रस्ताव ले कर मौसी से मिलने गए जय से मौसी के सवाल तो सदियों तक अमर रहनेवाले हैं।
इस तरह देखा जाए तो भारतीय फ़िल्म इतिहास में अपनी सफलता के परचम गाडनेवाली फ़िल्म शोले ऐसे ना जाने कितने सवालों से भरी है।
अगला सवाल जो मैं नहीं भूल पाता वो पूछा था एंथनी भाई ने फ़िल्म अमर, अकबर एंथनी में - "ऐसे तो आदमी लाइफ में दोइच टाइम भागता है, या तो ओलिम्पिक का रेस हो या पुलिस का केस हो, तुम किस लिए भागता है भाई?"
भाई शब्द से मुझे याद आ जाती है फ़िल्म दीवार, जिसमें सलीम-जावेद की जोड़ी ने कुछ बड़े ही बेहतरीन सवाल लिखे मगर इस बार सवाल दो भाइयों के बीच थे -
'भाई तुम साइन करते हो या नहीं?'
'आज मेरे पास बिल्डिंगें हैं, Property है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है, क्या है तुम्हारे पास?'

सिर्फ़ संवादों में सवालों को जगह मिली हो ऐसा नहीं है। कई सुपर हिट गीत सवालिया हैं। अब नागिन के गाने तन डोले मेरा मन डोले को ही ले लो। वैजयंती माला को टेंशन है की इतनी रात गए आख़िर 'कौन बजाये रे बाँसुरिया?' । सही भी है कल को आपके घर के नीचे कोई बेसुरी बाँसुरिया बजा कर गुस्से से आपके तन-मन दोनों को डोलने पर मजबूर करनेवाला कोई पड़ोसी आ गया आप भी पूछेंगे 'कौन बजाये रे बाँसुरिया?'
फिर कुछ भक्त टाइप के सवालिया गाने भी होते हैं जैसे - 'ज़रा सामने तो आओ छलिये, छुप छुप छलने में क्या राज़ है?' मगर इस तरह के सवालों में प्रायः उनके जवाब भी छिपे होते हैं, सो उन्हें स्यूडो सवालिया गाने बोलना बेहतर होगा।
उसके बाद छेड़छाड़-नुमा सवालिया गाने होते हैं जिन्हें लिखने में मजरूह साहब और आनंद बक्षी बड़े एक्सपर्ट थे।
मजरूह साहब के लिखे सवालिया गीतों में मेरा पसंदीदा है - "C A T CAT...Cat मानें बिल्ली, R A T RAT...Rat माने चूहा, दिल है तेरे पंजे में तो क्या हुआ?" आनंद बक्षी ने तो शायद सैकड़ों सवालिया गीत लिखे हैं - बागों में बहार है? और भी न जाने क्या क्या। मगर जब नये छोकरे नितिन ने सवालिया गीतों पर अपना हाथ ट्राई करने के लिए लिखा - 'आती क्या खंडाला' तो ये मजरूह साहब को नागवार गुज़रा और उन्होंने बेचारे नितिन पर ऐसी टिप्पणी कर दी कि दुखते दिल से नितिन ने उन्हें उस उमर में कचहरी का मुँह दिखा दिया और मजरूह साहब को उसने दुहाई भी दी तो उनके लिखे चूहे बिल्ली वाले उपरोक्त गीत की ही। मजरूह साहब को लिखित में इस नए नवेले गीतकार से माफ़ी मांगनी पड़ गई थी।
इसके अलावा होपलेस सवालिया गीत भी एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं जैसे 'अब कहाँ जाएँ हम?' या 'जाएँ तो जाएँ कहाँ' वगैरह।
तो कहने का मतलब ये कि जिस देश में पहले ही इतने सवाल मौजूद हैं वहाँ अगर कोई आ कर Q&A पर एक फ़िल्म बना ही लेता है तो उसपर सवाल क्यों खड़े करना? और वैसे भी श्रीराम राघवन अगर ये फ़िल्म बनाये भी तो हमारे देशवासी उस फ़िल्म को देखने नहीं जाने वाले, Johnny Gaddar जैसी शानदार फ़िल्म को हमारे लोगों ने नकार दिया। हाँ अगर Q&A इम्पोर्टेड माल बन कर हमारे पास पहुंचे हम उसे हाथों हाथ लेंगे ठीक उसी तरह जैसे योग वहाँ से लौट कर योगा बन जाए तो हम खुले हाथों से उसे अपनाने को तैयार हैं।
अच्छे फिल्मकार हमारे यहाँ भी हैं पर क्या हम उन्हें स्वीकार करने को तैयार हैं?

अब मुझे ये सवाल सता रहा है कि मैंने ये पोस्ट आख़िर किस विचार से शुरू की थी? मैंने होली की शुभकामनायें देने को पोस्ट शुरू की थी, होली की सोची तो गब्बर का सवाल याद आया और गब्बर के सवालों की सोची तो बाकी के सवाल दिमाग में आने लगे। आदत से मजबूर हैं क्या करें। बुरा ना मानो होली है ! आप सभी को रंगों के त्यौहार की एक दिन देर से रंगभरी शुभकामनायें.....

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हमारी नवीनतम फ़िल्म : अड़तालीस घंटे

>> Wednesday, February 4, 2009

डी एन ऐ समाचार पत्र ने फ़िल्म पर एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की है यहाँ

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अमिताभ - धर्मेन्द्र की दुर्लभ क़व्वाली : देख लो इश्क का

>> Tuesday, February 3, 2009


अमिताभ बच्चन और धर्मेन्द्र ने वैसे तो बहुत सी फिल्मों मे साथ काम किया है और कई फिल्मों में बतौर मेहमान कलाकार भी नज़र आए हैं, पर १९७७ में आई फ़िल्म चरणदास का यह गीत कुछ अलग ही है, जिसमें ये दोनों महानायक कव्वाल बने क़व्वाली करते नज़र आए हैं। आवाजें हैं (मेरी जानकारी के मुताबिक) अज़ीज़ नाजां साहब और येसुदास जी की।
मुझे ना तो ये क़व्वाली कभी सुनने को मिली न ये फ़िल्म देखने को। फ़िल्म वैसे भी काफ़ी गुमनाम सी ही है जो आई और चली गई परन्तु जब से यह यह दुर्लभ विडियो मुझे प्राप्त हुआ (मेरे मित्र दिव्य सोल्गामा जी के सौजन्य से, जिन्हें बॉलीवुड से सम्बंधित दुर्लभ विडियो, गीत, फिल्में संग्रह करने का शौक है) तब से मैं इस गीत को गुनगुना रहा हूँ।
गीत के अंत में धर्मेन्द्र का मस्ती भरा नृत्य देखना न भूलें।

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टिस्का प्लेटफॉर्म पर

>> Saturday, January 31, 2009

नहीं नहीं तारे ज़मीन पर मे ईशान नंदकिशोर अवस्थी की प्यारी सी परेशान मम्मी टिस्का चोपडा किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर नहीं आई हैं। मैं बात कर रहा हूँ बॉलीवुड में उनकी पहली फ़िल्म के विषय में। तारे ज़मीन पर के साथ बॉलीवुड में दूसरी एंट्री करने वाली टिस्का इससे पहले भी दो और नामो के साथ बॉलीवुड में अपनी तकदीर आज़मा चुकी हैं। प्रिया नाम के साथ 1990 में आई फ़िल्म गुलाबी रातें में एक छोटे से रोल के साथ टिस्का ने अपने करियर की शुरुआत की, पर उन्हें सही ब्रेक मिला 1993 में अजय देवगन के साथ, फ़िल्म थी प्लेटफॉर्म। फ़िल्म का एक गीत बड़ा चला था - मैं शमा तू परवाना। खैर गाने चलने के बावजूद न तो फ़िल्म चली, न टिस्का।
आप देखिये फ़िल्म का सबसे चर्चित गीत -


इसके बाद भी प्रिया /टिस्का ने कुछ छोटी बड़ी फिल्मों में छोटे मोटे रोल्स किए, पर तकदीर उनसे रूठी रही। ऐसी ही एक फ़िल्म थी 1994 में आई फ़िल्म बाली उमर को सलाम जिसमें प्रिया ने अपने पूरे नाम प्रिया अरोरा के साथ
नज़र आई कमल सदाना के साथ। फ़िल्म का संगीत था बप्पी लाहिरी का, जो काफ़ी चला मगर फ़िल्म नहीं चली।
फ़िल्म का एक गीत जो खासा चला था -


इसके बाद मणिरत्नम की बॉम्बे और ना जाने ऐसी कितनी फिल्मों में बहुत छोटे छोटे रोल्स निभा कर टिस्का अपने मॉडलिंग करियर पर ध्यान देने लगी। बीच में किए दो तीन टीवी सिरिअल्स पर अब उनका नाम प्रिया या प्रिया अरोरा नहीं टिस्का चोपडा था। फ़िर तो बस टिस्का ने हैदराबाद ब्लूज़ 2 की साथ में की कुछ क्रॉस ओवर फिल्में और Olay का विज्ञापन करके बन गई घर घर में जाना पहचाना नाम।
सफलता अब अधिक दूर नहीं थी। तारे ज़मीन पर में ईशान की परेशान माँ माया अवस्थी का किरदार निभा कर टिस्का बन गई हैं देश की सबसे चहेती माँ।

प्लेटफॉर्म से तारों तक का ये सफर आसान तो बिल्कुल नहीं रहा होगा, पर टिस्का की मुस्कान सारे संघर्षों को धता बताती वैसी की वैसी है, जैसी तब हुआ करती थी।

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इमोसनल अत्याचार और हमारे फिल्मकार

>> Friday, January 9, 2009

इन दिनों अनुराग कश्यप की फ़िल्म – देव-डी का गीत – इमोसनल अत्याचार मुझे काफ़ी पसंद आ रहा है…इसके ब्रास बैंड वाले वर्ज़न को सुन कर सर्दियों में होनेवाली उत्तर भारतीय शादियों - बरातों की यादें बरबस ताज़ा हो जाती है…और आजकल के बाकी धूम धड़ाकेदार गीतों से हट कर इसके बोल कुछ ऐसे मजेदार हैं की ये गीत पिछले हफ्ते से मेरे आई- ट्यून्स पर सर्वाधिक प्ले किए गीतों की लिस्ट में बना हुआ है…
आज यूँ ही मस्ती में ये गीत सुनते हुए जब मैंने इसके बोलों पर ध्यान दिया तो मुझे इस गीत में इसके निर्देशक अनुराग कश्यप का दर्द और उन पर हुए इमोशनल अत्याचार की झलक भी नज़र आई. अब मेरा ये सोचना किस हद तक सही है ये या तो अनुराग जी जानते हैं या इस गीत के गीतकार –



गीत देखिये और जो मैंने नोटिस किया उस पर गौर फरमाइए…(और बताइए आप क्या सोचते हैं?)
गीत के शुरुआत की लाईनें हैं - एक दो तीन चार…..छै…
मैंने सोचा इसमें से पाँच कहाँ गया…और याद आया बेचारे अनुराग जी की फ़िल्म पाँच ना जाने कब से डब्बा बंद है..और ना जाने ये कभी किसी थियेटर का मुंह देख भी पाएगी या नहीं…सो शायद इसलिए गीत की शुरुआत की गिनती में से भी पाँच का ज़िक्र उन्होंने निकाल दिया है…

फिर गीत में आगे एक पंक्ति और आती है – ये दिल पिघला के साज़ बना लूँ, धड़कन को आवाज़ बना लूँ, स्मोकिंग स्मोकिंग निकले रे धुंआ…

हम सभी को याद है की अनुराग की पिछली फ़िल्म नो स्मोकिंग थी और उसका क्या हश्र हुआ था…शायद इसीलिए वे इस लाइन के आगे कहते हैं

सपने देखे जन्नत के पर मिटटी में मिल जाएँ..

अपने पर हुए इस इमोशनल अत्याचार को बैंड बाजे के साथ गाने का अंदाज़ निराला अवश्य है…पर ये कोई नई बात नहीं कि ख़ुद की सफल/असफल फिल्मों को याद करके गाने बनाये जाएँ…
जब बात गानों में नए प्रयोग करने की हो, तो शोमैन राज कपूर हमेशा बाज़ी मार ले जाते हैं (इस पर एक विस्तृत पोस्ट करीब करीब तैयार है और जल्द ही इस चिट्ठे पर पोस्ट करूँगा) , जहाँ अनुराग ने इस एमोसनल अत्याचार को बैंड बाजे के साथ प्रस्तुत किया है, राज साहब ने अपनी दुःख भरी दास्ताँ पेश की थी एक दर्द भरे नगमें में अपनी फ़िल्म आवारा में.
गीत था – हम तुझसे मोहब्बत करके सनम, रोते भी रहे हँसते भी रहे…



याद कीजिये गीत की ये पंक्तियाँ –

ये दिल जो जला एक आग लगी…आंसू जो बहे बरसात हुयी…
बादल की तरह आवारा थे हम…रोते भी रहे हँसते भी रहे…

यदि आपको याद हो तो राज साहब कि बतौर निर्माता-निर्देशक पहली फ़िल्म थी – आग जो बड़ी बुरी तरह फ्लॉप हुयी थी, आग की असफलता से उनके आंसू बहे या नहीं ये तो पता नहीं मगर दूसरी फ़िल्म बरसात की अपार सफलता ने राज साहब को सातवें आसमान पर ला बिठाया…गौरतलब बात ये है कि बरसात की पटकथा और संवाद लिखे थे रामानंद सागर जी ने . आवारा राज साहब की तीसरी फ़िल्म थी जो बरसात से भी कहीं बड़ी हिट साबित हुयी…फिल्मकार मित्र राज के इस फिल्मी सफर को शैलेन्द्र जी की कलम ने इस गीत में बयान कर दिया.

(वैसे आवारा मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से एक है…कभी इस पर विस्तार से चर्चा करने का मन है इस चिट्ठे पर)

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देशभक्ति के बहाने भारत विरोध : जागृति(१९५४) की पाकिस्तानी नक़ल बेदारी (१९५७)

>> Thursday, January 8, 2009

पिछले दिनों Youtube पर भटकते भटकते अचानक एक गीत पर नज़रें टिकी - आओ बच्चों सैर कराएं तुमको पाकिस्तान की... मुझे बड़ी खुशी हुयी यह सोच कर कि चलो इस गाने के बहाने अपने पड़ोसी मुल्क के कुछ दर्शनीय स्थलों की झाँकी देख ली जाए. विडियो देख कर खुशी होने की जगह मन में एक अजीब सा गुस्सा और नफरत हुयी कि पाकिस्तान के लिए देशभक्ति का मतलब है अपने पड़ोसी भारत कि सहृदयता का नाजायज़ फ़ायदा उठा कर दर्शकों को भारत विरोधी विचार दिखाए जाएँ, वह भी एक ऐसी फ़िल्म के मध्यम से जो स्वयं एक भारतीय फ़िल्म की बेशर्म नक़ल है, यहाँ तक कि इसका संगीत भी पूरी तरह १९५४ में आई भारतीय फ़िल्म जागृति की नक़ल है.
जिस तरह अपने दौर में जागृति भारतीय बाल फ़िल्म दर्शकों के मन में एक गहरी छाप छोड़ गई वैसी छाप इस फ़िल्म ने पाकिस्तानी बाल दर्शकों के मन में ना ही डाली होती तो बेहतर था मगर आज के दौर और माहौल को देख कर लगता है कि ऐसी भड़काऊ फिल्मों/फ़िल्म संगीत ने देशभक्ति के नाम पर उन दर्शकों के मन में जो विषबीज बोए हैं वे आज एक विकराल वृक्ष बन कर हमारे देश के प्रति उनकी बदनीयती के रूप में फल-फूल रहा है...

समय निकाल कर ज़रा इन गानों को देखिये और देखिये कि किस तरह ना केवल ऐतेहासिक तथ्यों को तोडा मरोड़ा गया है बल्कि भारत विरोधी विचार किस तरह शहादत और संघर्ष की कड़वी चाशनी में लपेट कर प्रस्तुत किए गए हैं.
गाना १
आओ बच्चों सैर कराएं तुमको पाकिस्तान की : बेदारी (नक़ल)
ज़रा पंक्तियों पर गौर फ़रमाएँ : बंदूकों की छाँव में बच्चे होते हैं जवान यहाँ (अब ऐसे में उस देश से कसब और उसके जैसे अन्य बच्चे आतंकवादी ना बनें तो और क्या बनेंगे जिस देश में बदूकों की छांव में जवान होना शान की बात हो)

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झाँकी हिन्दुस्तान की : जागृति (असल)

गौर कीजिये बाल मन की कोमलता को ध्यान में रख कर देश की सांस्कृतिक और ऐतेहासिक झाँकी का कैसा मासूम चित्रण किया है पंडित प्रदीप ने.

गाना
हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के : बेदारी (नक़ल)


देशभक्ति के नाम पर जातिवाद और नफरत के साथ साथ कश्मीर पर बेजा कब्ज़ा करने की साजिश किस खूबी के साथ इस गीत में प्रस्तुत की गई है उनकी बानगी इन पंक्तियों में छलक छलक कर नज़र आती है -
दुनिया की सियासत के अजब रंग हैं प्यारे, चलना हैं मगर तुमको कुरान के सहारे .
और
लेना अभी कश्मीर है ये बात न भूलो, कश्मीर पर लहराना है झंडा उछाल के (आपने कभी अपने बच्चों को उन चीज़ों को हथियाने की शिक्षा ना दी होगी जिन पर उनका अधिकार नहीं मगर पाकिस्तान में ये शिक्षा का एक अहम् पहलू नज़र आता है इस गीत में सलीम राजा के एक्सप्रेशंस देख कर)
हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के :जागृति (असल)


ध्यान दीजिये प्रदीप जी की बच्चों को नसीहत और सीख पर -
दुनिया के दांव पेंच से रखना न वास्ता मंज़िल तुम्हारी दूर है लंबा है रास्ता (इस पंक्ति का पाकिस्तानी वर्ज़न ऊपर दिए गीत में आपने देखा ही होगा)।
और
उठो छलाँग मार के आकाश को छू लो, तुम गाड़ दो गगन पे तिरंगा उछल के (हमें अपना आसमान चाहिए किसी अन्य देश की ज़मीन पर नाजायज़ कब्ज़ा नहीं)
इन गीतों को देख कर साफ़ हो जाता है कि आख़िर क्यों उनके यहाँ आतंकवादी बन रहे हैं और हमारे यहाँ चंद्रयान? बोए पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए?

गाना
यूँ दी हमें आज़ादी : बेदारी (नक़ल)


इस गीत में तो तथ्य कुछ ऐसे तोड़ मरोड़ दिए गए कि सोच कर ही डर लगता है कि पाकिस्तान में विद्यार्थियों को इतिहास में न जाने क्या पढ़ाया जाता होगा?

ज़रा पंक्तियों पर गौर देने के साथ दृश्यों को अवश्य देखें -

हर चाल से चाह तुझे दुश्मन ने हराना (यहाँ इस्तेमाल में लायी गई है एक स्टॉक फुटेज जिसमें महात्मा गांधी जिन्ना के साथ मुस्कुराते नज़र आते हैं, गाँधी जी उनके दुश्मन हैं और उनकी मुस्कान एक चाल? )

मारा वो दाँव तुने कि दुश्मन भी गए मान - यहाँ स्टॉक फुटेज में गाँधी जी जिन्ना विदा लेते हुए हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं किंतु उसका कुछ और ही मतलब निकलती हैं ये पंक्तियाँ ।

यदि यह पकिस्तान का इतिहास है तो जिन्ना ने अपनी मृत्युशय्या पर पाकिस्तान को अपनी सबसे बड़ी गलती स्वीकारते हुए कुछ ग़लत नहीं किया ।


दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल : जागृति (असल)


अब इस गीत का वर्णन क्या किया जाए हम सबने इस गीत को अनगिनत बार सुना और गाया है ।


भारत में भी इस दशक के शुरुआत में कुछ पाक विरोधी फिल्में बनी हैं किंतु कभी पाकिस्तान पर इस तरह तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर हमला नहीं किया हिन्दी फिल्मकारों ने । हमने सदा उनके कलाकारों और फिल्मकारों को अवसर दिया है कि वे हमारे देश में आ कर अपनी कला का प्रदर्शन करें... परन्तु क्या इस तरह फिल्मों के नाम पर बाल मनोमस्तिष्क में नफरत के विषबीज बोना पाकिस्तान में कभी बंद होगा?











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Paanch Gaaney Aur Dhun Ek : Bahut Naainsaafi Hai!!

>> Friday, December 19, 2008

Prologue: Year was 1998 when I got my 1st Radio and started listening to Vividh Bharti. This was my first interaction with Hindi Film Music (more or less). I was so addicted to Vividh Bharti that I used to switch my radio on with their Morning Broadcast and turn it off only after they went off air around 11:05 pm everyday. No matter if I am solving an accountancy sum, drawing cartoons for local news papers or reading a comic book, Vividh Bharti was always there with me. While listening to these melodies I discovered many beautiful songs which were not only composed on same tunes but were very similar in the way they sounded yet they always sounded different and unique. This was way before I got introduced to FM Radio and much later worked with couple of FM Radio Channels myself.

Here I am going to talk about 5 different songs based on the same tune which was composed by Maestro S.D.Burman first time in the movie Naujawan in 1951. Have a look:

1. Thandi Hawaein Lehra Ke Aayein (Naujawan, 1951)-
Music :S.D.Burman, Lyrics: Sahir Ludhiyanvi, Singer: Lata Mangeshkar

One of the musical gems created by SDB & Sahir - One of the best Musical Teams in 50s Bollywood, sadly they parted ways after Pyaasa (1957) and never worked together.

2. Tera Dil Kahaan Hai (Chandni Chowk, 1954)-
Music: Roshan, Singer : Asha Bhosle, Lyrics: (Edit) -->
There were 3 lyricists for the film : Majrooh Sultanpuri, Shailendra and Raja Mehdi Ali (who penned this song is unknown to me)



Roshan Sahab loved Thandi Hawayein song so much that he went to SDB and asked him if he can use the same tune with minor changes here and there in one of the films he was composing songs for, Sachin Da was so impressed with Roshan Sahab’s honesty and his love for music that he couldn’t say no to him (an anecdote I heard long back on Vividh Bharti) and Roshan Sahab created Tera Dil Kahaan Hai. The song wasn’t as successful as Thandi Hawayein.

3. Rahein Na Rahein Hum (Mamta, 1966)-
Music : Roshan Sahab, Lyrics: Majrooh Sultanpuri, Singer: Lata Ji

Roshan Sahab created magic using the same tune for Mukhda (opening lines) for Rahein Na Rahein Hum in Mamta.

4. Humein Raaston Ki Zaroorat Nahin Hai (Naram Garam, 1981)-
Music : Rahul Dev Burman, Lyrics: Gulzar Sahab, Singer: Asha Bhosle
-->

Year was 1981 and Pancham Da tried his hands on the same tune for the first time in Naram Garam, which was directed by Hrishikesh Mukherjee. It was actually a sequel to Golmaal (1979), the film’s opening credits have a Golmaal Song too but the film failed to recreate the Golmaal magic on Box Office. Amol Palekar& Utpal Dutt play Ram Prasad and Bhawani Shankar respectively ALA Golmaal, Ram’s love interest Kusum was played by Miss India (1979) Swaroop Sampat who later on became Mrs. Paresh Rawal. Naram Garam was her second film I have always found her lips-syncs quite funny. Just like the film the song went almost unnoticed. But it has a striking resemblance to the Title track of Saagar.

PS. If you haven't seen Naram Garam...It's a must watch. Original DVDs available on T Series at Rs.45 only.

5.Saagar Kinare Dil Ye Pukare (Saagar, 1985)-
Music : R.D.Burman, Lyrics: Javed Akhtar, Singers: Kishore Kumar & Lata ji

Pancham Da recreated magic this time with the same tune (but for the first time as a Duet) in Saagar with some wonderful lyrics by Javed Sahab and soulful singing by Kishore Da & Lata ji. Kishore went on to win Best Playback Singer - Male for the song.
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Hope this time I am not gonna get the Hate Messages I got after posting Pixar Posts. Keep Listening, keep humming, keep commenting...



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Suraj Zara Aa Paas Aa: Beautiful Shammi Kapoor-Manna Dey Song

>> Tuesday, September 9, 2008

Yesterday I was watching TZP on DVD and the song Bum Bum Bole kind of reminded me of Suraj Zara Aa Paas Aa song from Ujala (1959), protagonist Ramu (Shammi Kapoor) sings this song with/for hungry underprivileged kids. Its very difficult to pen a beautiful and fun-filled positive song like this for such a gloomy scene, but that’s where lyricist Shailendra Sahab creates the magic. Ujala was written by Qamar Jalalabaadi, who himself was a great lyricist, but it were Shailendra & Hasrat Jaipuri who penned the songs for Ujala (Remember Jhoomta Mausam Mast Mahina penned by Hasrat Sahab?).

Normally you see Shammi Kapoor lip-syncing Mohd. Rafi’s voice most of the time, but in this song for a change it's Manna Dey who is providing the playback voice for Shammi...Music is by Shankar-Jaikishan (who are apparently my most favorite composers).


Suraj Zara Aa Paas Aa




(PS. Manna Dey also sung Ab Kahaan Jaaayein Hum for Shammi in this film, another classic song with haunting use of chorus by Shankar-Jaikishan)

Ab Kahaan Jaayein Hum

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Classic Mehmood Song : Mazarbaan Tu Kuthe?

>> Wednesday, August 27, 2008

Vidooshak left a comment on my last post- Helen: The Golden Girl and asked for a Mehmood post (or that's what I thought). That made me think of a classic Mehmood Song from the movie Sannata which I came across sometime back, Music by none other than Rajesh Roshan Sahab. Have a look and enjoy

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Helen : The Golden Girl


Came across this beautiful post on the documentary ‘Helen: Queen of The Nautch Girls’ on bollyviewer’s blog . I have been looking for this documentary for a longtime (though going through the only clip I could see its bit snobbish, bollyviewer vouchs for this too) . Unluckily by the time I reached her blog, the videos were removed from youtube (‘due to terms of use violation’ or so they say).

I learnt about this Documentary while reading Helen’s (unofficial) Biography by Jerry Pinto - Helen The Life and Times of An H-Bomb, a book which I bought because I was really interested to know more about Helen Ji & her journey from being a junior artist to becoming an indispensable performer for Bollywood, but sadly the book didn’t had much about Helen but was full with author’s personal and rather biased grudge against the film industry.

IMHO the book would be a better read, if inspite of citing Helen and the characters played by her, one after another just to prove Hindi Film Industry/Film Makers have often used (Roman) Catholic Characters played by her to depict Western Immorality (a topic which I felt was quite irrelevant and inane), Pinto should have narrated Helen’s Career Graph and her personal life; as the book was supposed to be on Helen, not on the writer’s observations of socio-economic infrastructure prevailing in the film industry in 40s & 50s.

Funnily, the book was Helen's Biography and Pinto was more interested in describing how/why her mentor choreographer Peter Lewis (who is singer/composer Leslie Lewis’ father) changed his name to P.L.Raj to survive in a ‘Hindu Chauvinistic’ Film Industry.
(For latecomers P.L.Raj was the guy who choreographed almost all the Classic Helen Hits like O Haseena Zulfonwali (Teesri Manzil 1966), Mungda (Inkaar 1977), Mehbooba (Sholay 1975), Yeh Mera Dil (Don 1978) etc.)

Anyway, much later I came to know that Jerry wrote the book without being able to meet Helen as she wasn’t interested in a book on her life.

There are two documentaries on Helen, where one can try to catch a glimpse of her off-screen persona but sadly both of these are not available in India.

  1. Merchant Ivory’s Documentary Helen: Queen of the Nautch Girls (which was shot & produced while shooting for Bombay Talkie (1970), it was distributed as an additional feature with Bombay Talkie DVD, sadly Indian DVD Version doesn’t have this Documentary)
  2. Nasreen Munni Kabir’s Helen: Always in Step , in which she was interviewed by Khalid Mohamed (and I have read somewhere Jerry himself saying – “it is clear that she did not enjoy playing herself in front of the camera (in Helen:Always in Step ), even though she comes across as warm and charming and unaffected.”).

After a long search on youtube I found this clip from Helen: Queen of the Nautch Girls, enjoy:





PS: If I remember correctly in the year 2000 there was this show called Helen: The Golden Girl, where all her celebrated hits were performed by actresses like Raveena, Isha Koppikar, Urmila etc. Listen to the original Helen Tracks they performed on here.

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Bollywood Culture

>> Tuesday, August 26, 2008

I’ve been contemplating the idea of starting a new blog on Hindi Cinema popularly called Bollywood and another blog on Indian Comic Books for a while. Yayawar Ki Diary (my other blog) has posts on Bollywood & Comics, but sometimes I have thoughts or trivia that can only be shared on a Dedicated Blog. So starting this one dedicated to Bollywood.

In India nothing sells like Bollywood. It’s a cult, it’s a culture in itself. Even if some intellectuals will refuse to accept Bollywood as a culture, it has been accepted universally. Have a look at this Video from ‘So You Think You Can Dance’ where Semi-Finalist couple Joshua & Katee perform a dance style that they call The Bollywood Dance.

They think Bollywood Dance is a dance form from India. It was funny but true (atleast for me) Bollywood as a culture has its own ‘Cultural Dance’. May be some people will discard it as Latka-Jhatka, so whenever a Shakira asks Farah Khan to help her getting her Latka-Jhatkas right or a Nicole Kidman dances to the beats of Chhamma Chhamma in Moulin Rouge! Bollywood is acknowledged as a cultural connotation to India & Indian Culture.

What do you say???

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